फलसफा-ए- जेहाद
जेहाद के मौजू पर इस्लाम में व्यापक द्रष्टिकोण मौजूद है, लेकिन इस विषय को जानबूझकर तोड़ मरोड़ कर और मनफी (नकारात्मक) जाविये पेश किये गए हैं, जो तराकी याफ्ता दौर में "Cave Religion (खोह या गार का मज़हब ) की अवधारणा (नज़रिए) को पेश करता है.
फलसफा-ए- जेहाद
कुरान करीम जन्नत को "अमन की जगह" कह रहा है. इस लिए मुसलमानों ने इस अमन या सुकून की जगह को हासिल करने के लिए हर कोशिश अपनी ज़ात के ऊपर या अपने अहल ओ अयाल के ऊपर या अपने गिरोह के ऊपर की जा रही है. यह बहुत बड़ा अलमिया है कि इस्लाम का इदराक "बे-खता" लोगों को मारने में किया जा रहा है.
जिहाद की तारीफ़ (difnition : परिभाषा ) :
मग़रिब की दुनिया ने जहाँ इस्लाम को समझने में ज़बरदस्त गलतियाँ कीं हैं, लफ्जे - जेहाद को भी बहुत फूहड़ ढंग से पेश किया गया है. जिहाद को "होली वार" (Holi War) के तौर पर तर्जुमा किया गया है. जबकि होली-वार का तर्जुमा "हर्ब-उल- मुक़दसः" है, जो कहीं भी कुरान की किसी भी आयात में नहीं मिलेगी. इस्लामिक हवालाजात में कहीं भी कोई ऐसा रेफरेंस नहीं मिलता जिससे यह पता चले की कभी भी इस्लाम ने "गैर-मुस्लिम" के ऊपर हमला करने या जंग की इजाज़त दी हों. सिर्फ इस लिए कि वोह मुसलमान नहीं हैं ऐसा कहीं नहीं है.
लफ्जे जिहाद, इस्तेख्राज किया गया है, लफ्जे "जहादा" से, जिसके मानी, तात्पर्य - "सख्त कोशिश करना, जद्दो जहद करना" है. इन्फिरादी तौर पर या शख्सि तौर पर जिहाद के मानी - इन्सान का अपनी ज़ात के अन्दुरुनी जौहर या सिफात के बचाव के लिए की जाने वाली सख्त कोशिश का नाम है, ताकि वोह इसको अल्लाह के सामने "सजदा" या इताअत का जो भी तरीका हों करके पेश कर सके. जिहाद उस कोशिश या जद्दो जहद को कहते है जो एहकाम ए इलाही को अदा करने के लिए की जाती है और हवाए नफस की मुखालफत, और शैय्तान की नाफ़रमानी के ज़रिये की जाती है, .
मजमूई (सामूहिक ) तौर पर जिहाद कई तरीके इख़्तियार कर सकता है, जैसे :-
- अकली या शउरी जिहाद : मज्मोई तौर पर इसमें वोह जद्दो जहद / कोशिशें मुहीत होती हैं जिसके ज़रिये से खुदा का हुक्म, इंसानों ( बनी-अदम ) तक पहुँचाया जाय और सामाजिक बुराइयाँ के सद्दे-बाब (खात्मा) के लिए इल्म, हिकमत, और हुरमत से पुर तक़रीर का इस्तेमाल किया जाय. जैसा कि कुरान ए करीम की इस आयात से ज़ाहिर होता है, " "और उस व्यक्ति से बात में कौन अच्छा हों सकता है जो अल्लाह की ओर बुलाय और अछे कर्म करे और कहे; "निसंदेह, मैं मुस्लिम (आज्ञाकारी) हूँ." ( कुरान : सूरा हां०मीम०सज्दा, ४१:३३)
- इख्तेसादी जिहाद (आर्थिक जिहाद - Economic Jihad) : यह वोह जिहाद है जिसमे हम अपने ज़राय आमदनी से कुछ हिस्सा मुफलिस और नादार लोगों, बेवाओं और यतीमो, मोहताजो और बे-आसरा लोगों के लिए खर्च करते हैं ताकि उनकी मदद हों सके.
- माद्दी जिहाद (भौतिक : physical ) जिहाद:इसमें वोह जिहाद शामिल है जिसमे इज्तिमाई तौर पर मुसल्लह अफराद (collectively armed ) ज़ुल्म के खिलाफ, इस्तेह्साल (शोषण) के खिलाफ या मुआवेज़ा के तौर पर किया जाता है.
- इस तरह हम देखते हैं कि जिहाद का तसव्वुर या नजरिया बहुत ही वसीह और कुशादा है.
माद्दी जिहाद :
जंग के मैदान में किया जाने वाला जिहाद सबसे आखिर गुज़र-गाह है, जिसमे सख्त ही नहीं, बल्कि शदीद शरायत मौजूद हैं. यह जिहाद हुर्रियत (आज़ादी ) के लिए ख़ास तौर पर ईमान की आजादी के लिए किया जाता है. कुरान ए करीम में इरशाद है, "अनुमति दी गई उन लोगो को जिनके विरुद्ध युध्ह किया जा रहा है, क्योंकि उन पर ज़ुल्म किया गया -- और निश्चय ही अल्लाह उनकी सहायता की पूरी सामर्थ्य रखता है." : (कुरान : अल-हज्ज, २२:३८)
आगे इरशाद ए बारी ए ताला है, "ये वे लोग हैं जो अपने घरो से नाहक निकाले गए, केवल इस लिए कि वे कहते हैं कि "हमारा रब अल्लाह है". यदि अल्लाह लोगो को एक दूसरे के द्वारा हटाता न रहता तो मठ और गिरजा और यहूदी प्रार्थना भवन और मस्जिदें, जिनमे अल्लाह का अधिक नाम लिया जाता है, सब ढ़ा दी जातीं. अल्लाह अवश्य उसकी सहायता करेगा -- निश्चय ही अल्लाह बड़ा बलवान, प्रभुत्वशाली है.
कुरान ए करीम में और भी कई मकामात हैं, जहाँ इस बात का तजकिरा किया गया है, मिसाल के तौर पर सूरए "आले इमरान" की आयात न० 75 में इरशाद होता है, " तुम्हे क्या हुआ है कि अल्लाह के मार्ग में और उन कमज़ोर पुरषों, औरतों और बच्चों के लिए युद्ध न करो, जो प्रार्थनाएं करते हैं कि "हमारे रब ! तू हमें इस बस्ती से निकाल, जिसके लोग अत्याचारी हैं. और हमारे लिए अपनी ओर से तू कोई सहायक नियुक्त कर".
इस तरह यह चीज़ वाजेह हों जाती है कि मादी जिहाद की तारीफ़ कुरान ए करीम ने साफ़ तौर पर वाजेह और मोइय्यन कर दी है, और उसकी शरायत से वाकिफ करा दिया गया है.
यह ज़रूर है कि इस्लाम नें ऊपर बयाँ की गई शरायत के तहत हालाँकि जिहाद की इजाज़त दी है, बल्कि कुछ हालात में वाजिब करार दिया है, लेकिन ज़िम्मेदारी के जाब्ते के तहत, इस्लाम के "सलामती" की छिपी हुई मंशा ज़ाहिर होती है. गैर फौजी या शहरियों के खिलाफ कोई जिदाल नहीं.
यहाँ भी कुरान रहनुमाई कर रहा है, " और अल्लाह की राह में उन लोगो से लड़ो जो तुमसे लड़े, लेकिन ज्यादती न करो. निसंदेह अल्लाह ज्यादती करने वाले को पसंद नहीं करता." (कुरान : सूरा बकरा : 2:190)
शहरियों के खिलाफ कोई जंग / हमला नहीं : इस्लाम ने यह नुमायाँ कर दिया है कि उसकी जंग / जेहाद किसी शहरी के खिलाफ नहीं है. और न ही उन लोगो के खिलाफ है जो जंग में हिस्सा नहीं ले रहे हैं. यह जंग सिर्फ लश्कर या जंगी रिसाले के खिलाफ है. आम अवाम जो फौजी नहीं है, उनसे कोई मतलब नहीं, उन्हें कोई ज़रर नहीं पहुँचाया जायेगा.
यहाँ पर भी कुरान का हुक्म मौजूद है, "और अल्लाह की राह में उन लोगो से लड़ो जो तुमसे लड़े, " कुरान : सूरा बकरा : 2:190)
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